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Jal Thal Mal

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शौचालय का होना या न होना भर इस किताब का विषय नहीं है| यह तो केवल एक छोटी सी कड़ी है, शुचिता के तिकोने विचार में| इस त्रिकोण का अगर एक कोना है पानी, तो दूसरा है मिटटी, और तीसरा है हमारा शरीर| जल, थल और मल| पृथ्वी को बचाने की बात तो एकदम नहीं है| मनुष्य की जात को खुद अपने को बचाना है, अपने आप ही से| पुराना किस्सा बताता है की समुद्र मंथन से विष भी निकलता है और अमृत भी| यह धरती पर भी लागू होता है| हमारा मल या तो विष का रूप ले सकता है या अमृत का| इसका परिणाम किसी सरकार या राजनीतिक पार्टी या किसी नगर की नीति-अनीति से तय नहीं होगा| तय होगा तो हमारे समाज के मन की सफाई से| जल, थल और मल के संतुलन से|

    210 pages
    Published 01-10-2018
  • Original Title : Jal Thal Mal
  • Publisher : Rajkamal Prakashan
  • Genre : Non , Environment , Geography
  • ISBN : 9388183363 (ISBN13: 9789388183369)
  • Edition :First Edition
  • Language : Hindi
  • User assigned genres :
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